Wednesday, September 18, 2013

एक अधूरी ख्वाहिश

बस्तर के बारे में अगर बाहरी लोगों से पूछिएगा तो बिना रुके जवाब मिलेगा बेहतरीन प्राकृतिक नजारा और नक्सली हिंसा के लिए जाना जाता है छत्तीसगढ़ का बस्तर...लेकिन कई ऐसे लोग भी मिलेंगे जो इन दोनों का नाम लिए बगैर आपको कहेंगे बस्तर अपने टारजन के लिए मशहूर है। बस्तर का टारजन चेंदरु अब इस दुनिया में नहीं है। उसने बस्तर को विश्व पटल पर उतारने का काम किया। स्वीडन के फिल्मकार अर्ने सक्सफोर्ड ने चेंदरु पर जंगलसागानाम की फिल्म बनाई थी। अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिल्म की चर्चा तो हुई ही साथ ही साथ चेंदरु यानी टाइगर ब्वाय के खतरनाक जानवरों से दोस्ती की भी बातें भी शुरू हुईं। चेंदरु मशहूर हो गया। उसने हमेशा जंगल के जानवरों के बीच रहना ही पसंद किया। उसे बाहरी चकाचौंध से कोई वास्ता नहीं था। वक्त के साथ साथ चेंदरु का परिवार भी बड़ा होता गया। परिवार बढ़ने के बाद उसे पता चला कि, जिंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए चंद रुपयों की दरकार होती है। अपनी ढलती उम्र और बीमारी के बावजूद उसने सरकार से...अधिकारियों से अपने बेटे को एक अदद नौकरी देने की मांग की पर अफसोस छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने धरोहर की इस मांग को अनसुना कर दिया। चाउर वाले बाबा यानी सीएम रमन सिंह कहते हैं कि, वो आम आदमी की सुनते हैं वो आम आदमी के प्रतिनिधि हैं वो बस्तर के विकास का दावा करते हैं मगर इन दावों की पोल चेंदरु की बीमारी के बाद मौत और उसकी उस ख्वाहिश ने खोल दी जो पूरा नहीं हो सका। बीमारी की इलाज के लिए और बेटे को नौकरी दिलाने के लिए उसने हर उस दहलीज पर अपना कदम रखा जहां उसे उम्मीद की किरण दिखाई देती थी, पर सड़े हुए सिस्टम को टाइगर ब्वाय की दहाड़ नहीं सुनाई पड़ी।  


No comments:

Post a Comment