Monday, October 22, 2012

'फना' हो गया 'मोहब्बत का महताब'



" तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं, वफा कर रहा हूं वफा चाहता हूं "  "वो मेरे पति हैं और वो मेरा प्यार है"   "मैं उससे बेपनाह मोहब्बत करती हूं और उसके लिए मैं करोड़ों की दौलत को लात मार सकती हूं"  "तुम उससे प्यार करते हो, तो फिर तुमने बिना इजहार किए ही ये कैसे सोच लिया कि, वो तुम्हें नहीं चाहती"   "पापा मैं आपसे झूठ नहीं बोल सकती और उसके प्यार के बगैर मैं जिंदा नहीं रह सकती" "नयनों के काजल से बादल में रंग भरने वाले"  ये सोच या फिर ये कहें कि,ये अल्फाज उस शख्स के हैं, जिसने दुनिया को मोहब्बत के हर उस पहलू से रु-ब-रु कराया । जिसे हर आम और खास अपना महसूस करता रहा और आगे भी करता रहेगा । आप समझ ही गए होंगे कि, मैं रोमांस के राजा, किंग्स और रोमांस, मोहब्बत के महताब और न जाने कितने उपाधियों से पुकारे जाने वाले मशहूर निर्माता-निर्देशक यश राज चोपड़ा की बात कर रहा हूं। कहते हैं वक्त अमूमन किसी का साथ नहीं देता और दाग अच्छे नहीं होते । मगर यश जी बॉलीवुड में शायद पहले ऐसे शख्स हुए जिनका वक्त ने पहले कदम पर साथ भी दिया और लोगों को दाग भी अच्छे लगने लगे । कल्पना की माया को वास्तविकता में परिणत करना हो, या फिर दो नायिकाओं के बीच में नायक को सामंजस बिठाने की बात । नायक को निगेटिव किरदार देकर मोहब्बत का मसीहा बना देना और एक अदने से इंसान को एंग्री यंग मैन की छवि में ढाल देना । कुछ ऐसी ही प्रतिभा के धनी थे भारतीय सिनेमा के यश । मोहब्बत है क्या चीज ? ये एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब बॉलीवुड में हर किसी ने अपने तरीके से दिया है लेकिन जितने अंदाज मोहब्बत को रुपहले पर्दे पर निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा ने परिभाषित किया अभी तक कोई और नहीं कर पाया है । फिल्म दाग से प्यार की कहानी को पर्दे पर उकेरने का सिलसिला जिस जोशीले अंदाज में यश साहब ने शुरू किया और जिस बखूबी से उन्होंने मोहब्बत से जुड़ी हर सवाल का दिया । उसे जब तक है जान भूला पाना नामुमकिन है । यश चोपड़ा ने बॉलीवुड में रोमांस का ऐसा ताना बाना बुना कि, भारतीय सिनेमा में यश चोपड़ा लब्ज का इजाद हो गया । यश जी ने न सिर्फ मानवीय प्रेम को ही पर्दे पर उतारा बल्कि,प्रकृति की सौंदर्य के प्रति भी लोगों का फिल्मों के जरिए लगाव बढ़ाया । सिनेमाई जगत में जब भी पीली सरसों की खेत और स्विट्जरलैंड की हसीन वादियां का जिक्र होगा । यकीन मनिए तब तब यश की चर्चा होगी ।  वक्त के साथ मोहब्बत के इस महताब ने जो सिलसिला शुरू किया वो थम जरूर गया है, पर जब तक है जान उन्हें भुलाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । क्योंकि मोहब्बत के महताब मरा नहीं करते फना होते हैं । हमेशा अपनी विचारों से लेखन का अंत किया जाता है, मगर इस लेखन का अंत मैं यश साहब के उस अल्फाज और संवाद से करना चाहता हूं जो उनके हैं सिर्फ उनके ।
" तेरी आंखों की नमकीन मस्तियां
तेरी हंसी की बेपरवाह गुस्ताखियां
तेरी जुल्फों की लहराती अंगराइयां
नहीं भूलूंगां मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"तेरा हाथ से हाथ छोड़ना
तेरा साथों का रूख मोड़ना
तेरा पलट के फिर न देखना
नहीं माफ करूंगा मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"बारिशों में तेर बेधड़क नाचने से
बात बात पर बेवजह तेरे रुठने से
छोटी छोटी तेरी बचकानी बदमाशियों से
मोहब्बत करूंगा मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"तेरे झूठे कसमें वादों से
तेरे जलते सुलगते ख्वाबों से
तेरी बेरहम दुआओं से
नफरत करूंगा मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"मेरी ढेढ़ी मेढ़ी कहानियां
मेरी ढेढ़ी मेढ़ी कहानियां
मेरे हंसते रोते ख्वाब
कुछ सुरीले बेसुरे गीत मेरे
कुछ अच्छे बुरे किरदार
वो सब मेरे हैं,वो सब मेरे हैं
तुम सब में मैं हूं
बस भूल मत जाना
याद रखना मुझे सब
जब तक है जान,जब तक है जान


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