Friday, May 6, 2011

यादें



कब,कौन,कैसे कोई ज़िंदगी में आ जाता है। पता नहीं चलता। हां,उसका अहसास तब होता है।जब वो आपसे दूर जाता है। या फिर आप उससे दूर होते हो। इस बात का अंदाजा पहली बार तब लगा जब एक बहुत ही ख़ास दोस्त ने मुझसे किसी कारणवश नाता तोड़ लिया। साल २००६ का वाकया है ये। रात को ११ बजे फोन आया। जब मैं दफ्तर से लौटकर गुवाहाटी के एक होटल में खाना खा रहा था। उसके एक शब्द ने मेरे मुंह का निवाला छिन लिया। और अश्कों की धारा बदले में दे दिया। कुछ दिनों तक उदास रहा। फिर काम में अपने व्यस्त कर लिया।फिर एक दिन पापा के गुजर जाने का दुखद समाचार मिला.उससे आजतक नहीं उबार पाया हू.नौकरी करते करते हैदराबाद आया.यहाँ बहुत दोस्त बने.३ साल कैसे बीत गया पता नहीं चला.हा,मालूम तब हुआ जब जी न्यूज़ ज्वाइन करने के लिए रायपुर आने लगा.सब इस बात को लेकर खुश थे की नई जॉब मिल गई.पर सबको इस बात का दुःख था कीं हम सब बिचाद रहे है.सबके नयन से आसू बह रहे थे.ट्रेन चल पड़ी इस वादे के साथं की फिर मिलेंगे.पर कब ये कोई नहीं janta था.इस wakye ne mujhe इस बात का एहसास kara diya की dosti kya है.कब,कौन,कैसे कोई ज़िंदगी में आ जाता है। पता नहीं चलता। हां,उसका अहसास तब होता है।जब वो आपसे दूर जाता है। या फिर आप उससे दूर होते हो।