Tuesday, March 8, 2011

राजनीति जो न कराए...




कहावत है."जंग और प्यार में सब जायज है".पर माफ़ कीजियेगा.इस कहावत में एक शब्द जोड़ने की हिमाकत कर रहा हू."जंग,प्यार और राजनीति में सब जायज है".आप सोचेगे ये गुस्ताखी आखिर क्यों कर रहा हू.७ फ़रवरी को दोपहर के वक़्त टी.वी.देख रहा था.अचानक एक ब्रेअकिंग न्यूज़ आई .खबर थी कि सी.वी.सी.थामस की नियुक्ति के मामले पर पीएम डॉ.मनमोहन सिंह सदन में गलती मान ली है.मन में थोडा सा अफ़सोस हुआ.फिर याद आया की मनमोहन सिंह को अब गलती मानने की आदत पड़ चुकी है.आखों के सामने सहज ही वो मंज़र घूम गया .जब पींएम ने कुछ दिनों पहले चुनिन्दा टी.वी.चैनल के संपादको को ७ रेसकोर्स बुलाया था.उस मौके पर जब एक संपादक ने उनसे सवाल किया कि.संचार घोटाले पर उनकी क्या राय है.तो उन्होंने सहज भाव से कहा कि."वो मुजरिम है पर जितना बताया जा रहा है उतना नहीं".वहां पर संपादको ने जो भी सवाल किये मनमोहन सिंह ने बड़ी ईमानदारी से उसका जवाब दिया.ज़रा सोचिये.अगर मनमोहन सिंह कि जगह कोई और होता तो क्या अपनी गलती मानता.और चलिए अगर गलती मान भी लेता.तो क्या.सीधे रास्ते से मानता.बिलकुल नहीं.बिना लाग लपेट के वो ऐसा नहीं करता.पर चूँकि मनमोहन सिंह न ही एक परीपक राजनेता है.और लोगो के जेहन में आज भी मनमोहन सिंह कि छवि एक खाटी अर्थशास्त्री की है.पर इस पोलिटिक्स ने उस खाटी शब्द को खाटी नहीं रहने दिया.बेईमानो के बीच आकर नीली पगड़ी और सफ़ेद लिबास पहनने वाले मनमोहन सिंह का जो हाल हो गया है.उससे तो यही कहा जा सकता है."राजनीति जो कराए"...

Friday, March 4, 2011

मौत की "करुणा"



मुंबई एक ऐसा शहर जिसके बारे में कहा जाता है.वहां जिंदगी २४ घंटे सडकों पर दौड़ती है.२७ नवम्बर १९७३ को भी इस शहर में कुछ ऐसा ही मंज़र था.कोई घर जाने की सोच रहा था.तो कोई घर से दफ्तर जाने की.पर इन सबके बीच एक शख्स ऐसा भी था.जो किसी को एक ऐसी जिंदगी देने की सोच रहा था.जिससे की वो मौत की भीख मांगने को मजबूर हो जाय.उस शख्स ने अपनी गन्दी खवाहिश तो पूरी कर ली.पर वो बेचारी आज भी एक ऐसी जिंदगी जी रही है.जो मौत से भी बदतर है.३७ साल बीत चुके है इस वाकये को.जब मुंबई के "के..एम अस्पताल "में कम करने वाली नर्स अरुणा शानबाग के साथ इसी अस्पताल में कम करने वाला एक सफाई कर्मी सोहनलाल बाल्मीकि ने इस तरह बलात्कार किया कि आज वो कोमा में है.हर दिन कि तरह उस दिन भी करुणा अपने घर से दफ्तर के लिए चेहरे पर मुस्कान लिए चली.अस्पताल पहुची.दिन भर मरीजो की सेवा की.फिर शाम ढलने पर अस्पताल के बेसमेंट में कपडे बदलने गई.अरुणा कपडे बदल ही रही थी कि दरिंदा सोहनलाल उसके पास आ धमका.और उसकी अस्मत को तार -तार कर दिया.अस्पताल के बेसमेंट में अरुणा की इज्ज़त लूट रही थी.और बेसमेंट के ऊपर मुंबई दौड़ रही थी.इस शोर शराबे और भाग दौड़ के बीच.जब तक लोग अरुणा के पास आते वो अपना सुध बुध खो चुकी थी.अरुणा अस्पताल गई.और कोमा में चली गई.इधर दरिंदा सोहनलाल महज सात सालो के लिए जेल गया.फिर छूट गया.और आज न्यू डेल्ही के निजी अस्पताल में अपनी बाकि की जिंदगी जी रहा है.पर अरुणा पिछले ३७ सालो से अस्पताल के उसी बिस्तर पर लेटी है.उसकी हालत ऐसी है कि वो करवट भी नहीं बदलती.सेवा में लगे लोगो को भी नहीं पहचानती.उसकी हालत इतनी बदतर हो चुकी है कि.उसकी सेवा करने वाली एक पत्रकार पिंकी वीरानी ने सुप्रीम कोर्ट में अरुणा के लिए मौत मांगी है.२४ फ़रवरी को उस गुहार पर आखिरी सुनवाई हुई.और कोर्ट ने २४ फ़रवरी तक के लिए फैसला टाल दिया.इस बीच ये बहस छिड गई है कि .क्या अरुणा को मौत दे दी जाय?.इस पर समाज के एक तबके का कहना है कि ...नहीं...तो एक तबका कहता है कि ...हा...हर कोई इस बहस में फंसा हुआ दिखाई दे रहा है.कोई ये नहीं कहता नज़र आ रहा है कि.क्या न एक ऐसा कानून बने जो सोहनलाल जैसे दरिन्दे को सबक सिखाने के लिए काफी हो.मेरी नज़र में कानून को सोहनलाल को फिर से गिरफ्तार कर लेना चाहिए.और उसे ऐसी सजा मिले जिससे वो भी अरुणा कि तरह मौत मांगने को मजबूर हो जाय.खैर.फिर से आते है बदनसीब अरुणा पर.जिसे शायद ही मालूम हो कि.उसके ऊपर इस वक़्त देश में बहस छिड़ी हुई है.३ दशक पहले अरुणा भी मुस्कुराती थी.उसके मन में भी कुछ अरमान थे.कुछ ही दिनों बाद उसके हाथो में शादी कि मेहँदी लगने वाली थी.लेकिन सोहन लाल ने उसके अरमानो को इस तरह रौंदा कि आज वो किताबो के पन्नो में खो चुकी है.वो जिंदा तो है.लेकिन लाश बनकर.और उसके जिस्म से निकलने वाली हर साँस "मौत की करुणा" की भीख मांग रही है.आखिर क्यों ?.सोचना पड़ेगा...इस देश को...देश के सिस्टम को...और देश के कानून को...