Friday, January 21, 2011

हमें तुम पर नाज़ है



अगर हौसला बुलंद हो.तो सारी अरचने अपने आप खत्म हो जाती है.अगर दिल में कुछ करने की हसरत हो.तो खुदा भी आपके साथ होता है.कुछ ऐसा ही हुआ बिहार के गया के इस सपूत अमित विशवकर्मा के साथ.गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाला ये पूत शारीरिक रूप से विकलांग है.पोलियो से पीड़ित है.वाबजूद इसके अमित अपने मन में पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनने का सपना संजोये हुए था.और आज उसे अपना सपना पूरा होते दिखाई दे रहा है.फ़िलहाल अमित आई .आई.टी.खड़गपुर में दाखिला ले चुका है.लेकिन इस मुकाम पर पहुचने से पहले उसे तमाम तरह की परेसनियो का सामना करना पड़ा.हम सब जानते है कि आई.आई.टी.की पढाई के लिए कितना पैसा होना चाहिए .पर अमित ने उसकी परवाह न करते हुए खुद से ही तैयारी करनी शुरू कर दी.दोस्तों से किताबे मांगकर .वो अपने सपने को पूरा करने में जुटा रहा.और आख़िरकार उसे सफलता मिल गई.उसका चयन आई.आई.टी.खड़गपुर में हुआ.पर उसे यहाँ भी आर्थिक सहायता की ज़रूरत थी.गरीबी का दंश झेलने वाला अमित और उसके पिता जीतेन्द्र कुछ पल के लिए ये सोचकर मायूस हो गए कि.इतना सारा पैसे वो कहाँ से लायेगे.और कौन क़र्ज़ देगा.पर कहते है न भगवन के घर देर है अंधेर नहीं.आई.आई.टी। में सलेक्ट होने के बाद पूरे इलाके में अमित का किस्सा लोग अपने बच्चो को सुनाने लगे.और एक दिन ये खुशखबरी गया के एस . एस.पी . अमित लोढ़ा के कानो तक पहुची.वे अमित से मिले.इस होनहार छात्र ने उन्हें अपनी समस्या बताई.फिर क्या था.एस.स.पी.और उनका विभाग अमित की मदद के लिए आगे आया.और उन्होंने अपने सहयोगियों की मदद से गरीब घर में जन्मे इस इंजीनियर को कम्युनिटी पुलिस के ज़रिये पढाई का सारा खर्च देने का जिम्मा ले लिया.पुलिस विभाग की इस पहल की तारीफ हर किसी ने की.अमित और उसके पिता के लिए तो हर पुलिस अधिकारी भगवान से कम नहीं है.अमित का जज्बा उन तमाम ऐसे लोगो के लिए मिसाल है.जो विकलांग होते हुए भी कुछ बनना चाहते है.क्योकि अमित ने बचपन से ही अपने जेहन में इस बात को बिठा लिया था कि "बदल सकती है तकदीरे,पलट सकती है तदबीरे,गर इंसा चाहे तो नई दुनिया खोज ही लेता है"अंत में अमित...हमें ही नहीं पूरी कायनात को तुम पर नाज़ है.

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